कबीर सागर के अध्याय बीर सिंह बोध के पृष्ठ 116 से 118 में कहा है किः-
परमेश्वर कबीर से राजा बीर सिंह बघेल ने विनती की कि हे सद्गुरू जी! सार शब्द बिन मोक्ष नहीं है तो मुझे सार शब्द देने का कष्ट करें। परमेश्वर कबीर जी ने एक तीर से तीन शिकार किए। बीर सिंह बघेल काशी नगरी के राजा थे। उसी नगर में एक विधवा ब्राह्मणी (नाम-चन्द्रप्रभा) रहती थी। उसकी एक पुत्र थी। उन दोनों ने भी परमेश्वर से सत्यनाम ले रखा था। वे दोनों माँ-बेटी भी सारशब्द के लिए बार-बार प्रार्थना किया करती थी। ब्राह्मणी चन्द्रप्रभा भगवान जगन्नाथ को इष्ट मानकर अटूट श्रद्धा से भक्ति करती थी। गुरू कबीर जी को मानती थी। उसने अपने आँगन में कपास (बाड़ी) बीजी। उसमें गंगा का पावन जल लाकर सिंचाई की। फिर उससे कपास निकालकर सूत बनाया और अपने हाथों कपड़ा बुना यानि एक धोती (साड़ी जैसी) बनाई जिसे भगवान जगन्नाथ के मंदिर में पुरी (प्रान्त-उड़ीसा) में अर्पित करना चाहती थी। एक-दो दिन में पुरी को रवाना होने वाली थी।
परमेश्वर कबीर जी ने कहा, राजन! आपको मैं सारशब्द देता हूँ, परंतु उसके लिए एक धोती की आवश्यकता पड़ती है। आप ऐसा करो, आपकी नगरी काशी में आपकी एक गुरू बहन ब्राह्मणी रहती है। उसने अपने घर के आँगन में कपास बीजकर स्वयं निकालकर कात-बुनकर एक धोती तैयार की है। वह धोती लाओ तो सारनाम मिलेगा। राजा बीर सिंह उस बहन के पास गए। उस बहन चन्द्रप्रभा को राजा के आने की खबर मिली तो पहले तो घबराई, कुछ संभलकर दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करके आदर से बैठाया। आने का कारण पूछा। राजा ने कहा, बहन! आज मुझे सारनाम मिलना है। गुरूदेव ने एक धोती मँगाई है जो अपने अपने घर के आँगन में बाड़ी बीजकर और सूत बुनकर तैयार की है। आप उसके बदले में चाहे कुछ गाँव ले लो बहन! मेरे जीवन कल्याण के लिए वह धोती दे दे। राजा बीर सिंह की यह बात सुनकर दोनों माँ-बेटी हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगी कि राजन! यह धोती भगवान जगन्नाथ जी के लिए बनाई है। हे राजन! बेसक हमारा सिर काट दो, परंतु हम यह धोती नहीं दे सकते। बीर सिंह ने कहा, बहन! सतगुरू देव जी ने मँगाई है। मैं राजा के तौर पर माँगने नहीं आया हूँ। आपकी इच्छा नहीं है तो मैं चला जाता हूँ।
बहन चन्द्रप्रभा तथा पुत्र ने राहत की साँस ली। राजा बीर सिंह बघेल ने जाकर सतगुरू कबीर जी को सब वार्ता बताई। तब सतगुरू देव जी ने कहा कि मैं अपनी शर्त छोड़ देता हूँ, मैं आपको बिना धोती के ही सारनाम दे दूँगा। आप एक काम करो। जब वह धोती भेंट करने पुरी को जाए, उस बहन चन्द्रप्रभा के साथ अपने सिपाही भेज दो। राजा ने दो सिपाही उस बहन के साथ भेज दिए ताकि कोई रास्ते में परेशान न करे। दोनों माँ-बेटी जगन्नाथ पुरी में चली गई। सुबह स्नान करके एक नारियल तथा धोती थाली में रखकर जगन्नाथ मंदिर में भेंट कर दी। देखते-देखते धोती वहाँ से उठी और मंदिर से बाहर आँगन में मिट्टी में गिरी। आकाशवाणी हुई कि यह धोती मैंने राजा बीर सिंह के द्वारा काशी में मँगवाई थी। वहाँ क्यों नहीं भेजी? यहाँ किसलिए लाई है?
जगन्नाथ तो काशी में बैठा है, जाओ, उसे भेंट करो। यह कौतुक सबने देखा। राजा के सिपाही भी यह सब देख रहे थे। आकाशवाणी भी सुनी। ब्राह्मणी बहन तथा उसकी पुत्र पश्चाताप करने लगी कि हम कितनी मूर्ख हैं, जगन्नाथ तो काशी में कबीर जी हैं। हम उन्हें सामान्य व्यक्ति जुलाहा ही मान रही थी। वहीं से रोने लगी थी, रह-रहकर रो रही थी। वापिस काशी नगरी में आ गए।
उस दिन भी परमेश्वर कबीर जी राजा बीर सिंह बघेल के महल में बैठे थे। चन्द्रप्रभा बहन, उसकी पुत्र तथा दोनों सिपाही कबीर परमेश्वर जी से मिले। साथ में राजा बीर सिंह बघेल बैठा था। वह ब्राह्मणी चन्द्रप्रभा परमेश्वर कबीर जी के चरणों में धोती रखकर बिलख-बिलखकर रोने लगी और कहा, मुझे भ्रम था कि आप केवल मानव हैं। हे सतगुरू! आप तो जगत के स्वामी साक्षात् जगन्नाथ हो। दोनों सिपाहियों ने सर्व घटना बताई। जो आकाशवाणी सुनी थी, वह भी बताई। तब राजा बीर सिंह को भी दृढ़ निश्चय हुआ। परमेश्वर कबीर जी ने कहा है कि :-
कबीर, गुरू मानुष कर जानते, ते नर कहिए अंध। होवें दुखी संसार में, आगै यम के फंद।।
गुरू गोविन्द कर जानियो, रहियो शब्द समाय। मिलें तो दण्डवत् बन्दगी, नहीं पल-पल ध्यान लगाय।।
तब परमेश्वर जी ने कहा, पहले अपना नाम शुद्ध कराओ, कमाई करो, फिर सारनाम दूँगा।
यह कहकर परमेश्वर जी ने उन सबका नाम शुद्ध किया।
परमेश्वर ने एक तीर से तीन शिकार किए। राजा को विश्वास नहीं था कि कबीर जी वास्तव में परमेश्वर हैं। वे उनको सिद्ध पुरूष मानते थे। यही दशा उस बहन ब्राह्मणी की थी, उन दोनों का भ्रम निवारण किया तथा अपनी महिमा से परिचित करवाया।
उपरोक्त प्रकरण से सिद्ध हुआ कि परमेश्वर जी नाम दीक्षा का क्रम तीन चरणों में पूरा करते थे। विश्व में कोई संत इस प्रकार दीक्षा को तीन चरणों में प्रदान नहीं करता। परमेश्वर कबीर जी के पश्चात् यह दास (रामपाल दास) तीन चरणों में दीक्षा का कार्य पूरा करता है।
बुद्धिमान को संकेत ही पर्याप्त होता है। यहाँ तो प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
कथा सारांश :- सार शब्द प्राप्ति के लिए साधक को विशेष ज्ञान होना आवश्यक है। परमात्मा और सतगुरू के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित होना अनिवार्य है। सर्व संसार-असार तथा दुःखालय मानना चाहिए। दीक्षा तीन चरणों में देने वाला वास्तव में सतगुरू है, वह तारणहार (कडि़हार गुरू=संसार से काड़ने यानि निकालने वाला गुरू) है।
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गीता अध्याय 8 श्लोक 13 में बताया है कि मुझ ब्रह्म का केवल एक ओम् (ऊँ) अक्षर है। उच्चारण करके स्मरण करता हुआ जो शरीर त्याग कर जाता है, वह परम गति को प्राप्त होता है। देवी पुराण में प्रमाण है कि ऊँ का जाप करके ब्रह्म लोक प्राप्त होता है। गीता अध्याय 8 श्लोक 16 में स्पष्ट है कि ब्रह्म लोक में गए साधक का भी पुनर्जन्म होता है।
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