संत गरीबदास के पंथ में एक दयाल दास नाम के साधु थे। उन्होंने गरीबदास पंथ का बहुत प्रचार किया। वह भ्रमण करके प्रचार करता था।
उसके साथ लगभग 500 (पाँच सौ) साधुओं की मण्डली (समूह) रहती थी। संत गरीबदास जी के हस्तलिखित ग्रन्थ को साथ रखते थे। उस समय तक संत गरीबदास जी के ग्रन्थ की कई कॉपी की जा चुकी थी। जब मण्डली एक शहर से दूसरे शहर में जाती थी तो संत गरीबदास जी के ग्रन्थ को एक संत सिर पर रखकर चलता था। उस ग्रन्थ की एक कॉपी किसी गिरी पंथ के साधु के हाथ लगी। उसने उसको पढ़ा तो पाया कि कबीर जुलाहे को सृष्टि का सृजनहार लिखा है :-
तीनों देवता काल है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश। भूले चुके समझियो, सब काहु आदेश।।
ब्रह्मा, विष्णु, महेशा, माया (देवी दुर्गा) और धर्मराया (ज्योति निरंजन) कहिए।
इन पाँचों मिल प्रपंच बनाया, वाणी हमरी लहिए।।
चलसी (नष्ट हो जाऐंगे) ब्रह्मा, विष्णु, महेश, चलसी नारद सारद शेषा।
इक्कीस ब्रह्मण्ड चलेंगे भाई, तब तुम रहोगे किसकी शरणाई।।
गिरी पंथ वाले भगवान शंकर जी के उपासक होते हैं। उन्हीं को समर्थ प्रभु मानते हैं। जिस कारण से उस गिरी ने स्वामी दयाल दास जी से बहुत विवाद किया तथा उनका बहुत विरोध किया।
एक दिन दयाल दास जी के मन में आया कि इस प्रकार की वाणियों को निकाल देता हूँ। उसने यह करने की ठान ली। सर्व तैयारी कर ली थी। उसी समय दयाल दास जी को अधरंग मार गया, शरीर का दांया भाग कार्य करना छोड़ गया। संत गरीबदास जी दिखाई दिए। कहा कि महात्मा जी आपने हमारे ज्ञान को ठीक से नहीं समझा। हमने यह भी लिखा है ’’ब्रह्मा, विष्णु, शम्भु शेषा, तीनों देव दयाल हमेशा’’। हमने स्थान व स्थिति अनुसार प्रत्येक देवता की स्थिति बताई है। जहाँ उनको काल इसलिए कहा कि वे काल के सर्व राज्य को चला रहे हैं। काल के खाने के लिए जीवों की उत्पत्ति, पालन तथा संहार कर रहे हैं। इसलिए इनको काल कहा है। वास्तव में ये काल नहीं हैं, बहुत विनम्र आत्मा के हैं। परन्तु इनका कार्य ऐसा है, वैसे ये देव रूप में बहुत दयालु हैं। किसी को नाजायज परेशान नहीं करते। अपने उपासकों की अपने सामर्थ्य अनुसार पूरी सहायता करते हैं, परंतु जन्म-मरण से न स्वयं मुक्त हैं, न इनके उपासक जन्म-मरण से मुक्त हो सके हैं। मेरी वाणी परमेश्वर कबीर जी की बख्शीश है। उनकी धरोहर है, इसमें किसी ने एक भी अक्षर काटा या जोड़ा तो उसको क्षमा का स्थान नहीं हैं। इतना कहकर अन्तर्ध्यान हो गए। उसके पश्चात् पूरे गरीबदास जी के पंथ में यह बात फैल गई। किसी ने उस वाणी में फेर-बदल नहीं किया। उसके पश्चात् वह ग्रन्थ विशेष जिज्ञासु तथा उपदेशी श्रद्धालु को देने लगे। गाँव छुड़ानी में स्वामी दयाल दास जी के नाम से एक आश्रम है जो गरीबदासीय साधु भक्त राम जी ने बनवा रखा है। पहले दयाल दास जी ने वहाँ एक मकान बनाया था। वे संत गरीबदास जी की जन्म स्थली लीला स्थली तथा परमेश्वर कबीर जी के प्रकट होने से पवित्र धाम छुड़ानी में प्रत्येक वर्ष सतसंग में आते थे। वहाँ सतसंग उस दिन किया जाता है जिस तिथि को संत गरीबदास जी को परमेश्वर कबीर जी मिले थे। फाल्गुन मास की सुदी द्वादशी को संत गरीबदास जी की वाणी का तीसरे दिन भोग लगता है। तीन दिन तक पाठ चलता है।
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God Kabir is the bestower of happiness.
ReplyDeleteHe alone is worthy of being worshipped. The world is milsled by Kaal/Satan. Only a true Guru can provide a true way to worship God Kabir.
"Satlok" is the eternal dwelling place of immortal God Kabir.
ReplyDeleteHeaven is a temporary dwelling place.
Heaven is not eternal.
सब धरती कारज करूँ, लेखनी सब बनराय
ReplyDelete।
सात समुद्र की मसि करूँ गुरुगुन लिखा न जाय ॥