Saturday, July 31, 2021

ब्राह्मण जन्म से नहीं कर्म से होते हैं

 रविदास जी ने सात सौ रूप बनाए’’

संत रविदास जी का जन्म चमार समुदाय में काशी नगर में हुआ। ये परमेश्वर कबीर जी के समकालीन हुए थे। परम भक्त रविदास जी अपना चर्मकार का कार्य किया करते थे।

भक्ति भी करते थे। परमेश्वर कबीर जी ने काशी के प्रसिद्ध आचार्य स्वामी रामानन्द जी को यथार्थ भक्ति मार्ग समझाया था। अपना सतलोक स्थान दिखाकर वापिस छोड़ा था। उससे पहले स्वामी रामानन्द जी केवल ब्राह्मण जाति के व्यक्तियों को ही शिष्य बनाते थे। उसके पश्चात् स्वामी रामानंद जी ने अन्य जाति वालों को शिष्य बनाना प्रारम्भ किया था। संत रविदास जी ने आचार्य रामानन्द जी से दीक्षा ले रखी थी। भक्ति जो परमेश्वर कबीर जी ने स्वामी रामानन्द जी को प्रथम मंत्र (केवल पाँच नाम वाला) बताया था, उसी को दीक्षा में स्वामी जी देते थे। संत रविदास जी उसी प्रथम मंत्र का जाप किया करते थे। एक दिन एक ब्राह्मण संत रविदास को रास्ते में मिला और बोला, भक्त जी! आप गंगा स्नान के लिए चलोगे, मैं जा रहा हूँ। संत रविदास जी ने कहा कि ‘मन चंगा तो कटोती में गंगा’, मैं नहीं जा रहा हूँ।

पंडित जी बोले कि आप नास्तिक से हो गए लगते हो। आप उस कबीर जी के साथ क्या रहने लगे हो, धर्म-कर्म ही त्याग दिया है। कुछ दान करना हो तो मुझे दे दो। मैं गंगा मईया को दे आऊँगा। रविदास जी ने जेब से एक कौड़ी निकालकर ब्राह्मण जी को दी तथा कहा कि हे विप्र! गंगा जी से मेरी यह कौड़ी देना। एक बात सुन ले, यदि गंगा जी हाथ में कौड़ी ले तो देना अन्यथा वापिस ले आना। यह कहना कि हे गंगा! यह कौड़ी काशी शहर से भक्त रविदास ने भेजी है, इसे ग्रहण करें। पंडित जी ने गंगा दरिया पर खड़ा होकर ये शब्द कहे तो गंगा ने किनारे के पास से भक्त की कौड़ी हाथ निकालकर ली और दूसरे हाथ से पंडित जी को एक स्वर्ण का कंगन दिया जो अति सुंदर व बहुमूल्य था। गंगा ने कहा कि यह कंगन परम भक्त रविदास जी को देना। कहना कि आपने मुझ गंगा को कृतार्थ कर दिया अपने हाथ से प्रसाद देकर। मैं संत को क्या भेंट दे सकती हूँ? यह तुच्छ भेंट स्वीकार करना।

पंडित जी उस कंगन को लेकर चल पड़ा। पंडित जी के मन में लालच हुआ कि यह कंगन राजा को दूँगा। राजा इसके बदले में मुझे बहुत धन देगा। वह कंगन पंडित जी ने राजा को दिया जो अद्भुत कंगन था। पंडित जी को बहुत-सा धन देकर विदा किया और उसका नाम, पता नोट किया। राजा ने वह कंगन रानी को दिया। रानी ने कंगन देखा तो अच्छा लगा। ऐसा कंगन कभी देखा ही नहीं था। रानी ने कहा कि एक कंगन ऐसा ही ओर चाहिए। जोड़ा होना चाहिए। राजा ने उसी पंडित को बुलाया और कहा कि जैसा कंगन पहले लाया था, वैसा ही एक और लाकर दे। जो धन कहेगा, वही दूँगा। यदि नहीं लाया तो सपरिवार मौत के घाट उतारा जाएगा। उस धोखेबाज (420) के सामने पहाड़ जैसी समस्य खड़ी हो गई। सब सुनारों (शर्राफों) के पास फिरकर अंत में परम भक्त रविदास जी के पास आया। अपनी गलती स्वीकार की। सर्व घटना गंगा को कौड़ी देना, बदले में कंगन लेना, उस कंगन को भक्त रविदास जी को न देकर मुसीबत मोल लेना आदि बताई। पंडित जी ने गिड़गिड़ाकर रविदास जी से अपने परिवार के जीवन की भिक्षा माँगी। रविदास जी ने कहा कि पंडित जी! आप क्षमा के योग्य नहीं हैं, परंतु परिवार पर आपत्ति आई है। इसलिए आपकी सहायता करता हूँ। आप इस पानी की कठौती (मिट्टी का बड़ा टब जिसमें चमड़ा भिगोया जाता था) में हाथ डाल और गंगा से यह कह कि भक्त रविदास जी की प्रार्थना है कि आप कठौती में आऐं और एक कंगन वैसा ही दें। ऐसा कहकर पंडित जी ने जो रविदास के चमार होने के कारण पाँच फुट दूर से बातें करता था, अब उस चाम भिगोने वाले कुंड (टब) में हाथ देकर देखा तो हाथ में चार कंगन वैसे ही आए। भक्त रविदास जी ने कहा कि पंडित जी! एक ले जाना, शेष गंगा जी को लौटा दे, नहीं तो भयंकर आपत्ति और आ जाएगी। ब्राह्मण ने तुरंत तीन कंगन वापिस कुण्ड में डाल दिए और एक कंगन लेकर राजा को दिया। रानी ने पूछा कि यह कंगन कहाँ से लाए हो, मुझे बता। ब्राह्मण ने संत रविदास जी का पता बताया। रानी ने सोचा कि कोई स्वर्णकार होगा और ढ़ेर सारे कंगन लाऊँगी।

रानी को एक असाध्य रोग था। पित्तर का साया भी था। बहुत परेशान रहती थी। सब जगह उपचार करवा लिया था। साधु-संतों का आशीर्वाद भी ले चुकी थी। परंतु कोई राहत नहीं मिल रही थी। रानी उस पते पर गई। साथ में नौकरानी तथा अंगरक्षक भी थे। रानी ने संत रविदास जी के दर्शन किए। दर्शन करने से ही रानी के शरीर का कष्ट समाप्त हो गया।

रानी को ऐसा अहसास हुआ जैसे सिर से भारी भार उतर गया हो। रानी ने संत जी के तुरंत चरण छूए। रविदास जी ने कहा कि मुझ निर्धन के पास मालकिन का कैसे आना हुआ? रानी ने कहा कि मैं तो सुनार की दुकान समझकर आई थी गुरूजी। मेरा तो जीवन धन्य हो गया।

रोग के कारण मेरा जीवन नरक बना था। आपके दर्शन से मैं स्वस्थ हो गई हूँ। मैंने इसके उपचार के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी थी। परंतु कोई लाभ नही हो रहा था। संत रविदास जी ने कहा कि बहन जी! आपके पास भौतिक धन तो पर्याप्त है। यह आपके पूर्व जन्म के पुण्यों का फल है। भविष्य में भी सुख प्राप्ति के लिए आपको वर्तमान में पुण्य करने पड़ेंगे।

आध्यात्म धन संग्रह करो। रानी ने कहा कि संत जी! मैं बहुत दान-धर्म करती हूँ। महीने में पूर्णमासी को भण्डारा करती हूँ। काशी तथा आसपास के ब्राह्मणों तथा संतों को भोजन कराती हूँ। संत रविदास जी ने कहा :-

बिन गुरू भजन दान बिरथ हैं, ज्यूं लूटा चोर। न मुक्ति न लाभ संसारी, कह समझाऊँ तोर।।

कबीर, गुरू बिन माला फेरते, गुरू बिन देते दान। गुरू बिन दोनों निष्फल हैं, चाहे पूछो बेद पुरान।।

रानी ने कहा कि हे संत जी! मैंने एक ब्राह्मण गुरू बनाया है। रविदास जी ने कहा कि नकली गुरू से भी कुछ लाभ नहीं होना। आप जी ने गुरू भी बना रखा था और कष्ट यथावत थे। क्या लाभ ऐसे गुरू से? रानी ने कहा कि आप सत्य कहते हैं। आप मुझे शिष्या बना लो।

रविदास जी ने रानी को प्रथम मंत्र दिया। रानी ने कहा कि गुरूजी! अबकी पूर्णमासी को आपके नाम से भोजन-भण्डारा (लंगर) करूंगी। आप जी मेरे घर पर आना। निश्चित तिथि को रविदास जी राजा के घर पहुँचे। पूर्व में आमंत्रित सात सौ ब्राह्मण भी भोजन-भण्डारे में पहुँचे। भण्डारा शुरू हुआ। रानी ने अपने गुरू रविदास जी को अच्छे आसन पर बैठा रखा था। उसके साथ सात सौ ब्राह्मणों को भोजन के लिए पंक्ति में बैठने के लिए निवेदन किया।

ब्राह्मण कई पंक्तियों में बैठे थे। भोजन सामने रख दिया गया था। उसी समय ब्राह्मणों ने देखा कि रविदास जी अछूत जाति वाले साथ में बैठे हैं। सब उठ गए और कहने लगे कि हम भोजन नहीं करेंगे। यह अछूत रविदास जो बैठा है, इसे दूर करो। रानी ने कहा कि यह मेरे गुरू जी हैं, ये दूर नहीं होंगे। संत रविदास जी ने रानी से कहा कि बेटी! आप मेरी बात मानो। मैं दूर बैठता हूँ। रविदास जी उठकर ब्राह्मणों ने जहाँ जूती निकाल रखी थी, उनके पीछे बैठ गए। पंडितजन भोजन करने बैठ गए। उसी समय रविदास जी के सात सौ रूप बने और प्रत्येक ब्राह्मण के साथ थाली में खाना खाते दिखाई दिए। एक ब्राह्मण दूसरे को कहता है कि आपके साथ एक शुद्र रविदास भोजन कर रहा है, छोड़ दे इस भोजन को।

सामने वाला कहता है कि आपके साथ भी भोजन खा रहा है। इस प्रकार प्रत्येक के साथ रविदास जी भोजन खाते दिखाई दिए। रविदास जी दूर बैठे कहने लगे कि हे ब्राह्मणगण! मुझे क्यों बदनाम करते हो, देखो! मैं तो यहाँ बैठा हूँ। इस लीला को राजा, रानी, मंत्र सब उपस्थित गणमान्य व्यक्ति भी देख रहे थे। तब रविदास जी ने कहा कि ब्राह्मण कर्म से होता है, जाति से नहीं। अपने शरीर के अंदर (खाल के भीतर) स्वर्ण का जनेऊ दिखाया। कहा कि मैं वास्तव में ब्राह्मण हूँ। मैं जन्म से ब्राह्मण हूँ। कुछ देर सत्संग सुनाया। उस समय सात सौ ब्राह्मणों ने अपने नकली जनेऊ (कच्चे धागे की डोर जो गले में तथा काख के नीचे से दूसरे कंधे पर बाँधी होती है) तोड़कर फैंक दी तथा संत रविदास जी के शिष्य हुए। सत्य साधना करके अपना कल्याण करवाया। सात सौ ब्राह्मणों द्वारा उतारे गए जनेऊओं का सूत सवा मन (50 किलोग्राम) तोल हुआ था।

गरीब, रैदास रंगीला रंग है, दिये जनेऊ तोड़। जगजौनार चौले धरे, एक रैदास एक गौड।।

वाणी नं. का सरलार्थ जग जौनार का अर्थ है धार्मिक भोजन-भण्डारा यानि धर्मयज्ञ। चोले = शरीर, धरे = धारण किए। गौड = ब्राह्मण। एक रविदास, उसके साथ एक गौड भोजन करते समय बैठे दिखाई दिए। रैदास = रविदास, रंगीला रंग = भक्ति रंग में मस्त भक्त। ब्राह्मणों ने (दिए जनेऊ तोड़) अपने-अपने जनेऊ तोड़ डाले और रविदास जी से सत्य साधना लेकर मोक्ष पाया।


••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••

आध्यात्मिक जानकारी के लिए आप संत रामपाल जी महाराज जी के मंगलमय प्रवचन सुनिए। साधना चैनल पर प्रतिदिन 7:30-8.30 बजे। संत रामपाल जी महाराज जी इस विश्व में एकमात्र पूर्ण संत हैं। आप सभी से विनम्र निवेदन है अविलंब संत रामपाल जी महाराज जी से नि:शुल्क नाम दीक्षा लें और अपना जीवन सफल बनाएं।

https://online.jagatgururampalji.org/naam-diksha-inquiry





No comments:

Post a Comment

अनुपूर्णा मुहिम पर सम्पूर्ण लेख - संत रामपाल जी महाराज द्वारा चलाया गया एक मानवता का मिशन

🔖 लेख का रूपरेखा (Outline) H1: अनुपूर्णा मुहिम: संत रामपाल जी महाराज की एक अनोखी पहल H2: परिचय: क्या है अनुपूर्णा मुहिम? H3: नाम क...