Saturday, July 31, 2021

द्रोपदी चीर हरण की सत्य कथा

 हे कृष्ण जी महाराज आपने भरी सभा में मेरी लाज़ रखी मैं द्रोपदी आपकी हदय से आभारी हुं । 

श्री कृष्ण जी बोले मैं तो रुक्मणि संग चौपड़ खेल रहा था द्रोपदी आपका चीर (वस्त्र) आपके किये गये‌ पुण्य से बढ़ा हैं । 

द्रोपदी को अब एक दम से सब याद आ गया कि अंधे बाबा जल में खड़े थे उनका वस्त्र बह गया तो मैं सखियों संग जा रही थी हमारी आवाज सुनकर लाज़वश  वो और गहरे पानी में गले तक चले गये । 

तो द्रोपती ने ना अपनी सखियों और दासियों को कहा स्वयं अपनी साडी का लीर फाड़ उस बाबा की तरफ बहा दिया एक दो कोशिश में वह लीर नहीं पहुंचा तो उसने एक लकड़ी पर लीर लपेट बाबा के हाथों तक पहुंचाया तब अंधे बाबा ने वस्त्र के स्पर्श से समझ लिया कि किसी बहन बेटी का वस्त्र है ।

तब उन्होंने कहा मेरी लाज़ रखने वाली परमेश्वर तुझे अनन्त दे । 


दौप सुता को दीन्ह लीर , जाके अनन्त बढाये चीर ।

रूकमणी कर पकडा मुस्कुराई , अनन्त कहा मोकू समझाई ।।

दुशासन ने द्रोपती पकडी , मेरी भक्ति सकल में सिखरी ।

जै मेरी भक्ति पछोडी होई तो हमरा नाम ना लेवे कोई ।।


सब समझ कर द्रोपदी बोली हे परमेश्वर 


एक लीर के कारणे , जिन्ह किन्हे मेरे लीर अपार ।

जो मैं ऐसा जानती तो  , अपना सर्वस्व देती वार ।।


मुझे अगर पता होता की एक साड़ी के टुकडे का अनन्त लीर करने वाले वो बाबा थे तो मैं अगर जानती तो अपनी सेवा , दान , पुण्य , भक्ति उस परम संत के चरण से समर्पित कर देती । 


वो अंधे बाबा बने कबीर परमेश्वर थे जिन्हें पता था द्रोपति पर भविष्य में यह मुसीबत आनी है इसलिए स्वयं उसके हाथ दान करवाने यह लीला कर गये । 

कबीर साहब जी कहते हैं 


जो जो मेरी शरण हैं ताका हुं मैं दास । 

गेल गेल लांगा फिरू तब लग धरती आकाश ।।


वैसे ही वर्तमान के लोग जिस भुलावे में जी रहे है आयु पुरी होने पर जब यह शरीर छुटेगा तब एहसास होगा कि धरती पर परम संत नहीं , परम ईश्वर आये हैं और हमने वो दांव समय चूक गये ।


https://youtu.be/ywx1eHZ3pTQ


#kabir_is_parameshwer



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