ज्ञान सागर का निष्कर्ष’’ Part C
पृष्ठ 27 से 51 तक श्री रामचन्द्र तथा श्री कृष्ण जी की लीला बताई है और सिद्ध किया है कि यह सब ज्योति निरंजन का षडयंत्र है। पहले तो अपने अवतारों को शक्ति दे देता है। फिर उनसे पाप करवाता है। फिर उनसे वह शक्ति छीन लेता है, उनका अन्त भी बुरा होता है। जब इसी लोक में ऐसी गति हुई तो ऊपर के लोक में क्या मिलेगा। श्री राम जी ने अन्त में अपने पुत्रों लव तथा कुश से पराजित होकर शर्म के मारे सरयू नदी में समाधि लेनी पड़ी यानि अपनी जीवन लीला सरयू नदी में छलांग लगाकर समाप्त की। पहले बाली तथा रावण जैसे योद्धाओं को मार डाला था।
यही दशा श्री कृष्ण जी की हुई थी। उनकी आँखों के सामने उनका पूरा यादव कुल नष्ट हो गया था तथा श्री कृष्ण जी के पैर में विषाक्त तीर एक बालिया नामक शिकारी ने मारा जिससे उनकी मृत्यु हुई। श्री कृष्ण जी ने बाली को त्रोता युग में वृक्ष की ओट लेकर मारा था। उसी आत्मा ने शिकारी बनकर अपना बदला लिया।
ज्ञान सागर का पृष्ठ 53 से 70 तक कबीर परमेश्वर जी का सत्ययुग, त्रोतायुग, द्वापर में सतसुकृत, मुनीन्द्र तथा करूणामय नाम से प्रकट होने वाला प्रकरण है जो बिल्कुल ऊट-पटांग तरीके से बताया है। वाणी कांट-छांट तथा बनावटी-मिलावटी बनाकर अपनी बुद्धि अनुसार व्याख्या की है जो गलत है।
वास्तविकता पहले वर्णन कर दी है।
पृष्ठ 71 से 74 तक कलयुग में काशी में प्रकट होने का प्रकरण।
पृष्ठ 74 पर वर्णन है कि बालक कबीर जी ने बछिया का दूध पीया। (कंवारी गाय का दूध पीया।)
पृष्ठ 75 से 76 रामानन्द जी से गुरू दीक्षा लेना आदि-आदि वर्णन है।
पृष्ठ 76 पर सिकंदर राजा को अपनी शरण में लेने वाला प्रकरण है।
उपरोक्त प्रकरण ‘‘कबीर चरित्र बोध‘‘ में भी हैं।
यथार्थ कबीर जी की लीला इस अध्याय में सम्पूर्ण नहीं है।
पृष्ठ 76 से 86 तक रतना को मिलना तथा अन्य जानकारी है जो ज्ञान प्रकाश में बताई जा चुकी है।
पृष्ठ 86 पर आठ कमलों की जानकारी है।
पृष्ठ 88 से 97 तक सामान्य ज्ञान है जो ज्ञान प्रकाश में बताया जा चुका है।
पृष्ठ 97 से 106 तक अस्पष्ट वर्णन है, इससे अधिक स्पष्ट ज्ञान पहले ज्ञान प्रकाश में धर्मदास को शरण में लेने वाले प्रकरण में पढे़ं।
विशेषः- जैसा कि ज्ञान सागर के सार के प्रारम्भ में लिखा है कि कबीर सागर धनी धर्मदास जी द्वारा लिखा था, वह हस्तलिखित था। बहुत अधिक बड़ा होने के कारण से किसी महंत ने उसमें से अपने विवेक के अनुसार कुछ-कुछ वाणी लेकर कुछ अपनी बनावटी बना-मिलाकर ज्ञान सागर बनाया है। इसी प्रकार अन्य कई अध्यायों में यही देखने को मिला है। बाद में स्वामी युगलानन्द जी भारत पथिक कबीर पंथी ने उन सर्व अध्यायों को कुछ न संशोधित करके एक कबीर सागर का रूप दे दिया गया जो अपने को वर्तमान में उपलब्ध है। इसलिए ’’ज्ञान सागर’’ में कोई भिन्न ज्ञान नहीं है। यह ज्ञान अन्य अध्यायों में विस्तार के साथ है।
पृष्ठ 52 से 53 तक सुदर्शन सुपच द्वारा पाण्ड़वों की यज्ञ पूर्ण करने का वर्णन है, परंतु पूर्ण रूप से गलत लिखा है। पूर्ण वर्णन आगे बताया जाएगा।
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