कबीर जी का काशी में प्रकट होना Part A
ज्ञान सागर में प्रकरण है। ’’कंवारी गाय (बछिया) के दूध से परमेश्वर कबीर की परवरिश’’ वाणी इस प्रकार है :-
कबीर जी का काशी में प्रकट होना’’
यहाँ पर नूरी गलत लिखा है नूरी नहीं नीरू को मिलने की कथा है। यह कुछ प्रकरण ठीक व कुछ गलत है। विवेचन करता हूँ :-
पृष्ठ 73,74 से वास्तव में नीरू तथा उसकी पत्नी नीमा द्वापरयुग में सुदर्शन सुपच के माता-पिता वाली आत्माऐं थी। उस समय परमेश्वर कबीर जी करूणामय नाम से प्रकट थे। सुदर्शन जी का जन्म वाल्मिकि जाति में हुआ था। सुदर्शन जी को पूर्ण विश्वास हो गया था कि करूणामय स्वयं पूर्ण परमेश्वर हैं। उस युग में कबीर परमेश्वर जी भी करूणामय की लीला करने के लिए एक कमल के फूल पर शिशु रूप में प्रकट हुए थे। उनको एक वाल्मिकि दम्पति अपने घर ले गए थे, वे निःसन्तान थे। कालू नाम से वाल्मिकि के घर परवरिश होने के कारण परमेश्वर करूणामय वाल्मिकि कहलाए। कालू की पत्नी का नाम गोदावरी था। सुदर्शन जी ने परमेश्वर करूणामय (कबीर) जी से विनय की थी कि हे परमात्मा! मेरे माता-पिता को अपनी शरण में लेकर कल्याण करें, परंतु सुदर्शन जी
के माता-पिता ने परमेश्वर की शरण नहीं ली, उपदेश नहीं लिया। उनकी मृत्यु हो गई। सुदर्शन जी ने अपने गुरू करूणामय जी यानि परमेश्वर कबीर जी से प्रार्थना की कि हे गुरूदेव! मेरे माता-पिता जी ने आपसे उपदेश नहीं लिया, उनका कल्याण कैसे होगा, मैं बहुत चिंतित हूँ। तब परमेश्वर कबीर जी ने विचार किया कि माता-पिता के मोह में भक्त भी मोक्ष प्राप्त नहीं कर पाएगा। जहाँ आशा तहाँ बासा होई, मन कर्म वचन सुमरियो सोई। इसलिए परमेश्वर कबीर जी ने अपने भक्त को विश्वास दिलाया कि मैं तेरे माता-पिता का कल्याण करूंगा। उनको अगले जन्म में शरण में लूँगा। यह मेरी प्रतिज्ञा है। तब भक्त सुदर्शन जी शान्त होकर भक्ति करने लगा। अगले जन्म में वे दोनों ब्राह्मण जाति में जन्में। दोनों का फिर विवाह हुआ, परंतु सन्तान नहीं हुई। उनको परमेश्वर कबीर जी 3 वर्ष की आयु के बच्चे के रूप में मिले। वे उस बच्चे को घर ले गए। बच्चा उनसे कहता कि आप परमात्मा की भक्ति शास्त्र विधि अनुसार नहीं कर रहे हो। मैं बताता हूँ शास्त्र अनुकूल साधना, मुझे गुरू बनाओ। यह सुनकर दोनों क्रोधित हो गए। कहा तू हमारे से ज्यादा जानता है क्या? कई बार परमेश्वर ने कोशिश की, परंतु वे दोनों बहुत क्रोध करते और एक बार परमात्मा को थप्पड़ मारने लगे तो परमेश्वर अन्तर्ध्यान हो गए।
फिर उस जन्म में नहीं मिले। वे दोनों मृत्यु के उपरांत फिर से ब्राह्मण कुल में जन्मे। दोनों का विवाह हुआ। बच्चे उस जन्म में भी नहीं हुए। ब्राह्मण का नाम गौरी शंकर तथा ब्राह्मणी का नाम सरस्वती था।
गौरी शंकर भगवान शिव का परम भक्त था। निःस्वार्थ शिव पुराण की कथा करता था। जो कोई स्वेच्छा से दान करता तो उससे अपना निर्वाह करते थे। शेष का भोजन भण्डारा (लंगर) करा देते थे।
जिस कारण से जनता में विशेष छाप (छवि) बनी थी। सब उनकी प्रशंसा करते थे। जिस कारण से अन्य ब्राह्मण गौरी शंकर से ईर्ष्या करते थे। मुसलमानों को यह भली-भाँति ज्ञान था। उन्होंने इसका लाभ उठाया। गौरी शंकर तथा सरस्वती को जबरन मुसलमान बना दिया। उनके घर में अपना झूठा पानी छिड़क दिया, उन दोनां के मुख में डाल दिया। सर्व स्वार्थी ब्राह्मणों ने मौके का लाभ उठाया।
काशी नगर में मुनादी करा दी कि गौरी शंकर तथा सरस्वती मुसलमान बन गए हैं।
जिस कारण से उनको शिव पुराण की कथा करने तथा गंगा दरिया में स्नान करने से मना कर दिया गया। मुसलमानों ने गौरी शंकर का नाम नूरअली रखा तथा सरस्वती का नाम नियामत रखा। पुरूष को नीरू तथा स्त्री को नीमा कहने लगे। निर्वाह की समस्या के कारण जुलाहे का कार्य करने लगे।
जिस कारण से जुलाहा कहलाए। गंगा में स्नान न करने देने के कारण अपनी झौंपड़ी से लगभग 4 कि.मी. दूर लहरतारा तालाब में स्नान करने जाने लगे। उस सरोवर में वर्षा के मौसम में गंगा दरिया का पवित्र जल पशु घाटों के अन्दर से लहरों के द्वारा उछलकर उस सरोवर को भर देता था। पूरे वर्ष वह जल स्वच्छ निर्मल रहता था। इसी कारण से उस जलाशय का नाम लहरतारा तालाब पड़ा। नीरू उर्फ गौरी शंकर तथा नीमा उर्फ सरस्वती भले ही मुसलमान बना दिए थे, परंतु वे फिर भी भगवान शंकर को दिल से मानते थे। उन्हीं का स्मरण करते थे। सन्तान न होने का दुःख भी बराबर था। विक्रमी संवत् 1455 ई. (सन् 1398) ज्येष्ठ मास की पूर्णमासी को सूर्य उदय से 1, 2 घण्टे पहले जिसे ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं, उस समय परमेश्वर अपने सत्यलोक से गति करके (चलकर) आए और उस लहरतारा सरोवर में कमल के फूल के ऊपर शिशु रूप धारण करके विराजमान हुए। उस समय एक अष्टानन्द नामक ऋषि जो स्वामी रामानन्द जी ब्राह्मण का शिष्य था, उस सरोवर में प्रतिदिन की तरह स्नान करके एकान्त स्थान पर शांत वातावरण में साधना कर रहा था। वहाँ पर वह ऋषि एक घण्टा प्रतिदिन साधना-स्मरण करता था। जब परमेश्वर कबीर जी सत्यलोक से नीचे अवतरित हो रहे थे तो उनके शरीर का दिव्य प्रकाश अष्टानन्द जी को दिखाई दिया। वह एक प्रकाश का गोला रूप में दिखा।
क्रमशः.....
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