Wednesday, August 4, 2021

दीक्षा की विधि

प्रसंग दीक्षा की विधि का चल रहा है। (आप जी को याद दिला दूँ कि कबीर सागर के संशोधनकर्ता स्वामी युगलानंद जी ने भी स्पष्ट कर रखा है कि समय-समय पर काल के भेजे दूतों ने कबीर पंथ के ग्रन्थों की दुर्दशा कर रखी है।)

अध्याय ‘‘ज्ञान प्रकाश बोध‘‘ पृष्ठ 56 :-

जिस समय परमेश्वर कबीर जी अंतर्ध्यान होकर पाँचवीं बार धर्मदास जी को सात दिन पश्चात् मिले तो पूछा कि प्रभु! इस दौरान कहाँ रहे?

दोहाः- धर्मदास कह नाई सिर, सुन प्रभु अगम अपार।

सात दिवस कहाँ रहे, कौन दिश पग डार।।

उत्तरः- सोरठाः-जौन दिश हम गौन कियो, धर्मनि सुनु चित लाय।

तहाँ पुनि शब्द प्रकाशेऊ, कालिंजर पहुँचे जाय।।

प्रश्न :- धर्मदास जी ने पूछा कि हे प्रभु! वहाँ पर आरती करके नारियल तोड़कर कितने जीवों को शब्द देकर काल से मुक्त करवाया?

उत्तर :- परमेश्वर कबीर जी ने आरती आदि करके पान परवाना नहीं दिया।

केवल वचनबद्ध करके यानि नाम दीक्षा देकर, साखी, रमैणी तथा शब्द यानि नाम दिया था।

उनको वचन का ठिकाना अर्थात् नाम के जाप से जो स्थान प्राप्त होता है, वह सत्यलोक उनको बता आया हूँ। वहाँ बहुत जीवों ने नाम लिया।

धर्मनि सुनहु ताहि सहिदाना। वाको नहीं दीना पान प्रवाना।।

आरती चौंका तहां न कीन्हा। नहीं तहां नारियर मोरो प्रवीना।।

वचन बंध जीवन कहं कियेऊ। साखी शब्द रमैणी दियेऊ।।

कहि आयेऊ तहं बचन ठिकाना। धर्मदास न देयऊ पान प्रवाना।।

अध्याय ‘‘ज्ञान प्रकाश‘‘ पृष्ठ 57 पर वाणी :-

जम्बूदीप (भारत) कलि के कडि़हारा। धर्मनि बहु जीव होवै पारा।।

धर्मनि वहाँ जीव पहुँचे आयी। देय दान उन मोर स्तुति लाई।।

शब्द मानि पुनि मस्तक नाया। पुरूष दर्श की बात जनाया।।

भावार्थ :- परमेश्वर कबीर जी ने स्पष्ट किया है कि जो आरती चौंका काल द्वारा भ्रमित दामाखेड़ा वाले धर्मदास जी को बिन्द वाले महंत या अन्य उनके वचन वाले शिष्य करते हैं, वह हमारी परंपरा नहीं है। कबीर सागर में चौंका आरती का विधान स्वार्थी महंतों ने जोड़ रखा है।

प्रमाण :- 1 आदरणीय संत गरीबदास जी को परमेश्वर कबीर जी गाँव-छुड़ानी के जंगल में मिले थे। वहीं पर कंवारी बछिया का दूध पीया था तथा उसी दूध से अमृत पान करवाकर वृक्ष के नीचे दीक्षा दी थी।

2 इसी प्रकार संत दादू दास जी को जंगल में मिले थे। उनको अपने करमण्डल (लोटे) से जल पान के पत्ते पर रखकर पिलाया था तथा दीक्षा दी थी, दोनों को पार किया। 

3 संत घीसादास जी को गाँव-खेखड़ा जिला-बागपत उत्तर प्रदेश में मिले थे। उनको भी अपने लोटे से जल पिलाकर जंगल में दीक्षा दी थी। उनका भी कल्याण किया। कोई आरती-चौंका करके नारियल नहीं फोड़ा।

4 संत नानक देव साहेब को कबीर परमेश्वर बेई नदी पर सुल्तानपुर में मिले। अपने करमण्डल से जल पिलाकर प्रथम मंत्र देकर सत्यलोक (सच्चखण्ड) लेकर गए। कोई आरती-चौंका नहीं किया।

सिद्ध हुआ कि दीक्षा देने के लिए आरती-चौंका करना व्यर्थ है।

परमेश्वर कबीर जी ने ‘‘अनुराग सागर‘‘ के पृष्ठ 140 पर स्पष्ट कर ही दिया है कि यह आरती चौंका जो धर्मदास के बिन्द यानि मंहत परम्परा वाले या उनकी शाखाओं वाले कर रहे हैं। यह काल द्वारा चलाए गये बारह पंथों में पाँचवां (5वां) पंथ टकसारी है, उस वाला चल रहा है जो व्यर्थ है। यथार्थ भक्ति विधि तथा दीक्षा कबीर जी ने अन्य महापुरूषों को भी दी है, कोई आरती चौका नहीं किया। जैसा भी समय या उसी अनुसार दीक्षा देकर जीव का उद्धार किया।

यही सामान्य विधि से दीक्षा यह दास (रामपाल दास) दे रहा है, उपदेशी को तुरन्त लाभ मिलता है और मोक्ष भी अवश्य होगा।


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4 comments:

  1. जन्म-मरण का दीर्घ रोग सत्य नाम व सारनाम बिना समाप्त नहीं हो सकता। ये सत्य मंत्र केवल पूर्ण संत रामपाल जी महाराज जी ही प्रदान करते हैं। उनसे नाम उपदेश लें और मोक्ष प्राप्त करें।

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  2. बिना धनी की बंदगी, सुख नही तीनो लोक।
    चरण कमल के ध्यान से, गरीब दास संतोष ॥

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  3. कबीरा तेरी झोपडी, गल कटीयन के पास |
    जैसी करनी वैसे भरनी, तू क्यों भया उदास ||

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  4. मानव जीवन का मूल उद्देश्य "भक्ति से भगवान" तक जाकर पूर्ण मोक्ष पाना है।
    जो की सिर्फ संत रामपालजी महाराज द्वारा बताई शास्त्रानुसार सत्य साधना करने से ही संभव है।
    भक्ति से भगवान तक पहुँचने का शास्त्रानुकूल मार्ग जानने के लिए देखें साधना चैनल शाम 07:30 बजे।

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